श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 149: बन्धन-मुक्ति, स्वर्ग, नरक एवं दीर्घायु और अल्पायु प्रदान करनेवाले शरीर, वाणी और मनद्वारा किये जानेवाले शुभाशुभ कर्मोंका वर्णन  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  13.149.45 
दुर्दर्शा: केचिदाभान्ति नरा: काष्ठमया इव।
प्रियदर्शास्तथा चान्ये दर्शनादेव मानवा:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
कुछ लोग अपनी दयनीय अवस्था के कारण लकड़ी (जड़) के समान प्रतीत होते हैं, और उन्हें देखना कठिन होता है। परन्तु कुछ ऐसे भी हैं जिनके दर्शन मात्र से ही मन प्रसन्न हो जाता है, और उन्हें देखना सुखदायी लगता है ॥ 45॥
 
Some people appear like wood (inanimate) due to their miserable condition, and it is difficult to look at them. Whereas there are some other people who make the mind happy just by their sight, and it feels pleasant to look at them. ॥ 45॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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