श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 149: बन्धन-मुक्ति, स्वर्ग, नरक एवं दीर्घायु और अल्पायु प्रदान करनेवाले शरीर, वाणी और मनद्वारा किये जानेवाले शुभाशुभ कर्मोंका वर्णन  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  13.149.30 
दुष्प्रणीतेन मनसा दुष्प्रणीततरा कृति:।
मनो बद्‍ध्यति येनेह शृणु वाक्यं शुभानने॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
शुभान्! जब मन में बुरे विचार आते हैं, तो मनुष्य के कर्म भी बुरे और भ्रष्ट हो जाते हैं, जिससे मन बंध जाता है। इस विषय में मेरी बात सुनो। 30।
 
Shubhan! When evil thoughts enter the mind, man's actions also become evil and corrupt, due to which the mind gets bound. Listen to me on this matter. 30.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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