श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 149: बन्धन-मुक्ति, स्वर्ग, नरक एवं दीर्घायु और अल्पायु प्रदान करनेवाले शरीर, वाणी और मनद्वारा किये जानेवाले शुभाशुभ कर्मोंका वर्णन  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  13.149.28 
उमोवाच
मनसा बद्‍ध्यते येन कर्मणा पुरुष: सदा।
तन्मे ब्रूहि महाभाग देवदेव पिनाकधृत्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
उमा ने पूछा - महाभाग! पिनाकधारी देवदेव! मुझे उस मानसिक कर्म के विषय में बताइए, जिसके कारण मनुष्य सदैव बंधन में पड़ता है॥28॥
 
Uman asked – Mahabhag! Pinakdhari Devdev! Tell me about the mental karma by which a person always falls into bondage. 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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