श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 149: बन्धन-मुक्ति, स्वर्ग, नरक एवं दीर्घायु और अल्पायु प्रदान करनेवाले शरीर, वाणी और मनद्वारा किये जानेवाले शुभाशुभ कर्मोंका वर्णन  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  13.149.27 
एष वाणीकृतो देवि धर्म: सेव्य: सदा नरै:।
शुभ: सत्यगुणो नित्यं वर्जनीयो मृषा बुधै:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
देवि! यह वाणी से उत्पन्न धर्म है। मनुष्यों को इसका सदैव पालन करना चाहिए। विद्वानों को उचित है कि वे सदैव अच्छे और सत्य वचन बोलें और असत्य का त्याग करें॥27॥
 
Devi! This is the Dharma born of speech. Human beings should always follow it. It is appropriate for learned people to always speak good and truthful words and abandon falsehood*॥ 27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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