श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 149: बन्धन-मुक्ति, स्वर्ग, नरक एवं दीर्घायु और अल्पायु प्रदान करनेवाले शरीर, वाणी और मनद्वारा किये जानेवाले शुभाशुभ कर्मोंका वर्णन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  13.149.2 
कर्मणा मनसा वाचा त्रिविधं हि नर: सदा।
बध्यते बन्धनै: पाशैर्मुच्यतेऽप्यथवा पुन:॥ २॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य सदैव मन, वाणी और कर्म - इन तीन प्रकार के बंधनों से बंधा रहता है और फिर उन बंधनों से मुक्त हो जाता है ॥2॥
 
A man is always bound by the three kinds of bondages of mind, speech and action, and then he is freed from those bondages. ॥2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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