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mahabharat 13.148.9: जो ब्राह्मण ब्राह्मणत्व को त्यागकर क्षत्रिय धर्म को अपनाता है, वह अपने धर्म से विमुख हो जाता है और क्षत्रिय योनि में जन्म लेता है॥9॥   |   mahabharat अध्याय 13.148: ब्राह्मणादि वर्णोंकी प्राप्तिमें मनुष्यके शुभाशुभ कर्मोंकी प्रधानताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 148: ब्राह्मणादि वर्णोंकी प्राप्तिमें मनुष्यके शुभाशुभ कर्मोंकी प्रधानताका प्रतिपादन  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  13.148.9 
यस्तु विप्रत्वमुत्सृज्य क्षात्रं धर्मं निषेवते।
ब्राह्मण्यात् स परिभ्रष्ट: क्षत्रयोनौ प्रजायते॥ ९॥
 
 
अनुवाद
जो ब्राह्मण ब्राह्मणत्व को त्यागकर क्षत्रिय धर्म को अपनाता है, वह अपने धर्म से विमुख हो जाता है और क्षत्रिय योनि में जन्म लेता है॥9॥
 
A Brahmin who abandons brahminhood and adopts the religion of a Kshatriya, deviates from his religion and is born as a Kshatriya.॥ 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)