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mahabharat 13.148.58: देवि! शुचिस्मिते! ब्राह्मणत्व प्राप्त होने पर मनुष्य को चाहिए कि वह अपने मन और इन्द्रियों को वश में रखे तथा योनिशुद्धि, तप, दान और शुभ कर्मों द्वारा उनकी रक्षा करे ॥58॥   |   mahabharat अध्याय 13.148: ब्राह्मणादि वर्णोंकी प्राप्तिमें मनुष्यके शुभाशुभ कर्मोंकी प्रधानताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 148: ब्राह्मणादि वर्णोंकी प्राप्तिमें मनुष्यके शुभाशुभ कर्मोंकी प्रधानताका प्रतिपादन  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  13.148.58 
ब्राह्मण्यं देवि सम्प्राप्य रक्षितव्यं यतात्मना।
योनिप्रतिग्रहादानै: कर्मभिश्च शुचिस्मिते॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
देवि! शुचिस्मिते! ब्राह्मणत्व प्राप्त होने पर मनुष्य को चाहिए कि वह अपने मन और इन्द्रियों को वश में रखे तथा योनिशुद्धि, तप, दान और शुभ कर्मों द्वारा उनकी रक्षा करे ॥58॥
 
Goddess! Shuchismite! After attaining Brahminhood, a man should keep his mind and senses under control and protect it through purification of vagina, austerity and charity and good deeds. 58॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)