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mahabharat 13.148.5: हे प्रभु! हे निष्पाप भूतनाथ! कृपया मेरे इस संदेह का समाधान करें। शूद्र, वैश्य और क्षत्रिय - ये तीनों वर्ण स्वाभाविक रूप से ब्राह्मणत्व कैसे प्राप्त कर सकते हैं?॥5॥   |   mahabharat अध्याय 13.148: ब्राह्मणादि वर्णोंकी प्राप्तिमें मनुष्यके शुभाशुभ कर्मोंकी प्रधानताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.148.5 
एतन्मे संशयं देव वद भूतपतेऽनघ।
त्रयो वर्णा: प्रकृत्येह कथं ब्राह्मण्यमाप्नुयु:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! हे निष्पाप भूतनाथ! कृपया मेरे इस संदेह का समाधान करें। शूद्र, वैश्य और क्षत्रिय - ये तीनों वर्ण स्वाभाविक रूप से ब्राह्मणत्व कैसे प्राप्त कर सकते हैं?॥5॥
 
O Lord! O sinless Bhootnath! Please resolve this doubt of mine. How can people belonging to the three castes – Shudra, Vaishya and Kshatriya – naturally attain brahminhood?॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)