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mahabharat 13.148.48: देवि! यदि शूद्र भी जितेन्द्रिय होकर पवित्र कर्मों द्वारा अपने अन्तःकरण को शुद्ध कर लेता है, तो वह द्विज के समान ही सेवायोग्य हो जाता है - ऐसा स्वयं ब्रह्माजी का कथन है ॥48॥   |   mahabharat अध्याय 13.148: ब्राह्मणादि वर्णोंकी प्राप्तिमें मनुष्यके शुभाशुभ कर्मोंकी प्रधानताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.148.48 
कर्मभि: शुचिभिर्देवि शुद्धात्मा विजितेन्द्रिय:।
शूद्रोऽपि द्विजवत् सेव्य इति ब्रह्माब्रवीत् स्वयम्॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
देवि! यदि शूद्र भी जितेन्द्रिय होकर पवित्र कर्मों द्वारा अपने अन्तःकरण को शुद्ध कर लेता है, तो वह द्विज के समान ही सेवायोग्य हो जाता है - ऐसा स्वयं ब्रह्माजी का कथन है ॥48॥
 
Goddess! If even a Shudra, being Jitendriya, purifies his conscience by performing holy deeds, he becomes as serviceable as a Dwija – this is the statement of Brahmaji himself. 48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)