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mahabharat 13.148.47: यदि ब्राह्मण आचारहीन होकर वर्णसंकर लोगों के घर भोजन करता है, तो वह अपना ब्राह्मणत्व त्यागकर उन्हीं के समान शूद्र हो जाता है ॥47॥   |   mahabharat अध्याय 13.148: ब्राह्मणादि वर्णोंकी प्राप्तिमें मनुष्यके शुभाशुभ कर्मोंकी प्रधानताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.148.47 
ब्राह्मणो वाप्यसद्‍वृत्त: सर्वसंकरभोजन:।
ब्राह्मण्यं स समुत्सृज्य शूद्रो भवति तादृश:॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
यदि ब्राह्मण आचारहीन होकर वर्णसंकर लोगों के घर भोजन करता है, तो वह अपना ब्राह्मणत्व त्यागकर उन्हीं के समान शूद्र हो जाता है ॥47॥
 
If a Brahmin becomes immoral and takes food at the houses of people belonging to mixed castes, then he gives up his brahminhood and becomes a shudra like him. ॥ 47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)