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mahabharat 13.148.45: इस प्रकार पुण्यात्मा क्षत्रिय अपने कर्मों से प्रत्येक जन्म में ज्ञान, संस्कार से युक्त ब्राह्मण और वेदों का ज्ञाता होता है ॥45॥   |   mahabharat अध्याय 13.148: ब्राह्मणादि वर्णोंकी प्राप्तिमें मनुष्यके शुभाशुभ कर्मोंकी प्रधानताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 148: ब्राह्मणादि वर्णोंकी प्राप्तिमें मनुष्यके शुभाशुभ कर्मोंकी प्रधानताका प्रतिपादन  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  13.148.45 
ज्ञानविज्ञानसम्पन्न: संस्कृतो वेदपारग:।
विप्रो भवति धर्मात्मा क्षत्रिय: स्वेन कर्मणा॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार पुण्यात्मा क्षत्रिय अपने कर्मों से प्रत्येक जन्म में ज्ञान, संस्कार से युक्त ब्राह्मण और वेदों का ज्ञाता होता है ॥45॥
 
In this way, a virtuous Kshatriya, by his deeds, becomes a Brahmin full of knowledge, culture and an expert in the Vedas in every birth. 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)