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mahabharat 13.148.44: वह धर्म में स्थित हो और मंत्र द्वारा त्रिविध अग्नि को तपाने वाला शुद्ध मन वाला हो। यदि वह गौओं और ब्राह्मणों के हित के लिए शत्रुओं का सामना करते हुए युद्ध में मारा जाए, तो अगले जन्म में ब्राह्मण होगा। 44॥   |   mahabharat अध्याय 13.148: ब्राह्मणादि वर्णोंकी प्राप्तिमें मनुष्यके शुभाशुभ कर्मोंकी प्रधानताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.148.44 
गोब्राह्मणहितार्थाय रणे चाभिमुखो हत:।
त्रेताग्निमन्त्रपूतात्मा समाविश्य द्विजो भवेत्॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
वह धर्म में स्थित हो और मंत्र द्वारा त्रिविध अग्नि को तपाने वाला शुद्ध मन वाला हो। यदि वह गौओं और ब्राह्मणों के हित के लिए शत्रुओं का सामना करते हुए युद्ध में मारा जाए, तो अगले जन्म में ब्राह्मण होगा। 44॥
 
He should be established in Dharma and have a pure mind by tending the threefold fire with mantra. If he is killed in battle while facing the enemy for the welfare of cows and Brahmins, then he will be a Brahmin in the next birth. 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)