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अर्थाद् वा यदि वा कामान्न किंचिदुपलक्षयेत्।
पितृदेवातिथिकृते साधनं कुरुते च य:॥ ४२॥
अनुवाद
उसे स्वार्थ या कामना से कुछ भी प्रदर्शित नहीं करना चाहिए। जो अपने पूर्वजों, देवताओं और अतिथियों की सेवा करने का प्रयत्न करता है, वही श्रेष्ठ क्षत्रिय है। 42।
He should not display anything out of selfishness or desire. He who strives to serve his ancestors, gods and guests is the best Kshatriya. 42.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥