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mahabharat 13.148.39: अपने कार्य में कुशल, सदाचारी क्षत्रिय को ग्राम धर्म (संभोग) में स्वच्छंद रूप से लिप्त नहीं होना चाहिए। उसे सदैव अपनी पत्नी के पास ही सोना चाहिए, केवल उसके रजस्वला होने के समय।   |   mahabharat अध्याय 13.148: ब्राह्मणादि वर्णोंकी प्राप्तिमें मनुष्यके शुभाशुभ कर्मोंकी प्रधानताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.148.39 
ग्राम्यधर्मं न सेवेत स्वच्छन्देनार्थकोविद:।
ऋतुकाले तु धर्मात्मा पत्नीमुपशयेत् सदा॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
अपने कार्य में कुशल, सदाचारी क्षत्रिय को ग्राम धर्म (संभोग) में स्वच्छंद रूप से लिप्त नहीं होना चाहिए। उसे सदैव अपनी पत्नी के पास ही सोना चाहिए, केवल उसके रजस्वला होने के समय।
 
A virtuous Kshatriya who is efficient in his work should not indulge in the village religion (sexual intercourse) freely. He should always sleep next to his wife only during her period.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)