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mahabharat 13.148.22: जो शुभ एवं दुर्लभ ब्राह्मणत्व को प्राप्त करके भी उसकी अवहेलना करता है और अभक्ष्य अन्न खाता है, वह निश्चय ही ब्राह्मणत्व से गिर जाता है ॥22॥   |   mahabharat अध्याय 13.148: ब्राह्मणादि वर्णोंकी प्राप्तिमें मनुष्यके शुभाशुभ कर्मोंकी प्रधानताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.148.22 
ब्राह्मणत्वं शुभं प्राप्य दुर्लभं योऽवमन्यते।
अभोज्यान्नानि चाश्नाति स द्विजत्वात् पतेत वै॥ २२॥
 
 
अनुवाद
जो शुभ एवं दुर्लभ ब्राह्मणत्व को प्राप्त करके भी उसकी अवहेलना करता है और अभक्ष्य अन्न खाता है, वह निश्चय ही ब्राह्मणत्व से गिर जाता है ॥22॥
 
He who, after attaining the auspicious and rare brahminhood, disregards it and eats inedible food, certainly falls from brahminhood. ॥22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)