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mahabharat 13.148.21: जो ब्राह्मण अपने पेट में अन्न के अवशेष रखकर मरता है, वह उसी योनि में जाता है। वह जिसका अन्न खाता है, उसी के गर्भ में जन्म लेकर अपना जीवन निर्वाह करता है। ॥21॥   |   mahabharat अध्याय 13.148: ब्राह्मणादि वर्णोंकी प्राप्तिमें मनुष्यके शुभाशुभ कर्मोंकी प्रधानताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.148.21 
यस्यान्नेनावशेषेण जठरे यो म्रियेद् द्विज:।
तां तां योनिं व्रजेद् विप्रो यस्यान्नमुपजीवति॥ २१॥
 
 
अनुवाद
जो ब्राह्मण अपने पेट में अन्न के अवशेष रखकर मरता है, वह उसी योनि में जाता है। वह जिसका अन्न खाता है, उसी के गर्भ में जन्म लेकर अपना जीवन निर्वाह करता है। ॥21॥
 
A Brahmin who dies with the remains of food in his stomach, goes to the same womb. He takes birth in the womb of the person whose food he eats to sustain his life. ॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)