Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.148.10-11: जो दुर्लभ ब्राह्मणत्व प्राप्त करके भी लोभ और मोह के वशीभूत होकर अपनी मन्दबुद्धि के कारण वैश्य का कर्म करता है, वह वैश्य योनि में जन्म लेता है। अथवा यदि वैश्य शूद्र के कर्म अपनाता है, तो वह भी शूद्र गति को प्राप्त होता है। शूद्रोचित कर्म करके अपने धर्म से विमुख हुआ ब्राह्मण शूद्रत्व को प्राप्त होता है। 10-11॥ | mahabharat अध्याय 13.148: ब्राह्मणादि वर्णोंकी प्राप्तिमें मनुष्यके शुभाशुभ कर्मोंकी प्रधानताका प्रतिपादन । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
वैश्यकर्म च यो विप्रो लोभमोहव्यपाश्रय:।
ब्राह्मण्यं दुर्लभं प्राप्य करोत्यल्पमति: सदा॥ १०॥
स द्विजो वैश्यतामेति वैश्यो वा शूद्रतामियात्।
स्वधर्मात् प्रच्युतो विप्रस्तत: शूद्रत्वमाप्नुते॥ ११॥
अनुवाद
जो दुर्लभ ब्राह्मणत्व प्राप्त करके भी लोभ और मोह के वशीभूत होकर अपनी मन्दबुद्धि के कारण वैश्य का कर्म करता है, वह वैश्य योनि में जन्म लेता है। अथवा यदि वैश्य शूद्र के कर्म अपनाता है, तो वह भी शूद्र गति को प्राप्त होता है। शूद्रोचित कर्म करके अपने धर्म से विमुख हुआ ब्राह्मण शूद्रत्व को प्राप्त होता है। 10-11॥
The one who, after attaining the rare Brahminhood, is under the influence of greed and attraction and does the work of a Vaishya because of his dullness, is born in a Vaishya. Or if a Vaishya adopts the activities of a Shudra, he also attains Shudra status. A Brahmin who has deviated from his religion by performing Shudrochit deeds attains Shudratva. 10-11॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥