श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 147: उमा-महेश्वर-संवाद, वानप्रस्थ-धर्म तथा उसके पालनकी विधि और महिमा  »  श्लोक d42-d43
 
 
श्लोक  13.147.d42-d43 
प्रजार्थमपि लोकार्थं महद्भि: क्रियते तप:।
तपसा प्राप्यते सर्वं तपसा प्राप्यते फलम्॥
दुष्प्रापमपि यल्लोके तपसा प्राप्यते हि तत्॥ )
 
 
अनुवाद
महापुरुष समस्त प्रजा और समस्त लोकों के कल्याण के लिए तपस्या करते हैं। तपस्या से ही सब कुछ प्राप्त होता है। तपस्या से ही मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। संसार की दुर्लभ वस्तुएँ भी तपस्या से ही सुलभ हो जाती हैं।
 
Great men perform penance for the welfare of all subjects and entire worlds. Everything is achieved through penance. The desired result is achieved through penance. Even the rare things in the world become accessible through penance.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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