श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 147: उमा-महेश्वर-संवाद, वानप्रस्थ-धर्म तथा उसके पालनकी विधि और महिमा  »  श्लोक d36-d37
 
 
श्लोक  13.147.d36-d37 
श्रीमहेश्वर उवाच
धर्मचर्यां तथा देवि वालखिल्यगतां शृणु॥
मृगनिर्मोकवसना निर्द्वन्द्वास्ते तपोधना:।
अङ्गुष्ठमात्रा: सुश्रोणि तेष्वेवाङ्गेषु संयुता:॥
 
 
अनुवाद
श्री महेश्वर बोले- देवि! वलखिलयों के धर्माचरण का वर्णन सुनो। वे मृगचर्म धारण करते हैं, शीत-ग्रीष्म आदि के द्वन्द्व उन पर प्रभाव नहीं डालते। तपस्या ही उनका धन है। सुश्रुणि! उनके शरीर की लंबाई अंगूठे के बराबर है, वे सभी एक ही शरीर में एक साथ रहते हैं।
 
Shri Maheshwar said- Goddess! Listen to the description of the religious practices of the Valkhilis. They wear deerskin, the conflicts of cold and heat etc. have no effect on them. Penance is their wealth. Sushruni! The length of their bodies is equal to that of a thumb, they all live together in the same bodies.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd