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mahabharat 13.147.d31-d33: वे रोग और मृत्यु से रहित होकर घोर तपस्या करते हैं और अपनी शक्ति से मृत्यु को भी भयभीत कर देते हैं। इन्द्रलोक में उनके लिए अनेक सुख संचित हैं। दिव्य सुखों से संपन्न होकर वे देवताओं के समान हो जाते हैं।   |   mahabharat अध्याय 13.147: उमा-महेश्वर-संवाद, वानप्रस्थ-धर्म तथा उसके पालनकी विधि और महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 147: उमा-महेश्वर-संवाद, वानप्रस्थ-धर्म तथा उसके पालनकी विधि और महिमा  »  श्लोक d31-d33
 
 
श्लोक  13.147.d31-d33 
संचरन्ति तपो घोरं व्याधिमृत्युविवर्जिता:॥
स्ववशादेव ते मृत्युं भीषयन्ति च नित्यश:॥
इन्द्रलोके तथा तेषां निर्मिता भोगसंचया:।
अमरै: समतां यान्ति देववद्भोगसंयुता:॥
 
 
अनुवाद
वे रोग और मृत्यु से रहित होकर घोर तपस्या करते हैं और अपनी शक्ति से मृत्यु को भी भयभीत कर देते हैं। इन्द्रलोक में उनके लिए अनेक सुख संचित हैं। दिव्य सुखों से संपन्न होकर वे देवताओं के समान हो जाते हैं।
 
They perform severe penance without disease and death and scare death with their own power. There are many pleasures stored up for them in Indraloka. They become equal to the gods by being blessed with divine pleasures.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)