| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 147: उमा-महेश्वर-संवाद, वानप्रस्थ-धर्म तथा उसके पालनकी विधि और महिमा » श्लोक d3-d4 |
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| | | | श्लोक 13.147.d3-d4  | देशा: परमपुण्या ये नदीवनसमन्विता:।
अबोधमुक्ता: प्रायेण तीर्थायतनसंयुता:॥
तत्र गत्वा विधिं ज्ञात्वा दीक्षां कुर्याद् यथाक्रमम्।
दीक्षित्वैकमना भूत्वा परिचर्यां समाचरेत् ॥ | | | | | | अनुवाद | | जो परम पुण्य क्षेत्र नदियों और वनों से भरे हुए हैं, वे प्रायः अज्ञान से रहित हैं, तीर्थों और पूजा स्थलों से सुशोभित हैं, उनमें जाकर क्रमशः धर्म का ज्ञान प्राप्त करो और ऋषिधर्म की दीक्षा ग्रहण करो, तथा दीक्षा प्राप्त होने पर एकनिष्ठ होकर धर्म-पालन में लग जाओ। | | | | The most virtuous regions filled with rivers and forests are generally free from ignorance and are adorned with pilgrimages and places of worship. Go to them and acquire the knowledge of the law and take the initiation of Rishidharma respectively and after being initiated, be single-minded and start nursing. | | ✨ ai-generated | | |
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