श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 147: उमा-महेश्वर-संवाद, वानप्रस्थ-धर्म तथा उसके पालनकी विधि और महिमा  »  श्लोक d27
 
 
श्लोक  13.147.d27 
श्रीमहेश्वर उवाच
ते वै वैखानसा नाम वानप्रस्था: शुभेक्षणे।
तीव्रेण तपसा युक्ता दीप्तिमन्त: स्वतेजसा॥
सत्यव्रतपरा धीरास्तेषां निष्कल्मषं तप:।
 
 
अनुवाद
श्री महेश्वर बोले- शुभेक्षणे! जो वैखानस नामक वानप्रस्थ हैं, वे अत्यन्त कठिन तपस्या में लीन रहते हैं। वे अपने तेज से चमकते हैं। वे सत्यनिष्ठ और धैर्यवान होते हैं। उनकी तपस्या में पाप का लेशमात्र भी नहीं होता।
 
Shri Maheshwar said- Shubhekshane! Those who are Vanaprasthas named Vaikhanas, remain engaged in very tough penance. They shine with their brilliance. They are truthful and patient. There is not even a trace of sin in their penance.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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