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श्लोक 13.147.57  |
सुखं वसति धर्मात्मा दिवि देवगणै: सह।
वीरलोकगतो नित्यं वीरयोगसह: सदा॥ ५७॥ |
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| अनुवाद |
| वह धर्मात्मा देवलोक में देवताओं के साथ सुखपूर्वक निवास करता है और योद्धाओं के लोक में निरन्तर निवास करता है तथा शूरवीरों के साथ संयुक्त रहता है ॥57॥ |
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| That righteous soul resides happily with the gods in the world of gods and constantly stays in the world of warriors and is united with the brave men. 57॥ |
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