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श्री महाभारत
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पर्व 13: अनुशासन पर्व
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अध्याय 147: उमा-महेश्वर-संवाद, वानप्रस्थ-धर्म तथा उसके पालनकी विधि और महिमा
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श्लोक 32
श्लोक
13.147.32
क्षान्तो दान्तो जितक्रोधो धर्मभूतो विहिंसक:।
धर्मे रतमना नित्यं नरो धर्मेण युज्यते॥ ३२॥
अनुवाद
क्षमाशील, बुद्धिमान, क्रोध को जीतने वाला, धार्मिक, अहिंसक और सदैव धर्मपरायण मनुष्य ही धर्म का फल प्राप्त कर सकता है ॥32॥
Only a forgiving, intelligent, conqueror of anger, religious, non-violent and always devout man can reap the rewards of religion. 32॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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