vedamrit
Reset
Home
ग्रन्थ
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
श्रीमद् भगवद गीता
______________
श्री विष्णु पुराण
श्रीमद् भागवतम
______________
श्रीचैतन्य भागवत
वैष्णव भजन
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 13: अनुशासन पर्व
»
अध्याय 147: उमा-महेश्वर-संवाद, वानप्रस्थ-धर्म तथा उसके पालनकी विधि और महिमा
»
श्लोक 32
श्लोक
13.147.32
क्षान्तो दान्तो जितक्रोधो धर्मभूतो विहिंसक:।
धर्मे रतमना नित्यं नरो धर्मेण युज्यते॥ ३२॥
अनुवाद
क्षमाशील, बुद्धिमान, क्रोध को जीतने वाला, धार्मिक, अहिंसक और सदैव धर्मपरायण मनुष्य ही धर्म का फल प्राप्त कर सकता है ॥32॥
Only a forgiving, intelligent, conqueror of anger, religious, non-violent and always devout man can reap the rewards of religion. 32॥
✨ ai-generated
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd