श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 147: उमा-महेश्वर-संवाद, वानप्रस्थ-धर्म तथा उसके पालनकी विधि और महिमा  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  13.147.22 
श्रीमहेश्वर उवाच
स्वैरिणस्तपसा देवि सर्वे दारविहारिण:।
तेषां मौण्डॺं कषायश्च वासे रात्रिश्च कारणम्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
श्री महेश्वर बोले - देवी! सभी वानप्रस्थ तप में लीन रहते हैं, उनमें से कुछ स्वतन्त्र विचरण करने वाले होते हैं (वे अपनी पत्नियों को साथ नहीं रखते) और कुछ अपनी पत्नियों के साथ रहते हैं। स्वतन्त्र विचरण करने वाले ऋषिगण सिर मुंडाकर भगवा वस्त्र धारण करते हैं; (उनका कोई निश्चित स्थान नहीं होता) किन्तु जो अपनी पत्नियों के साथ रहते हैं, वे रात्रि में अपने आश्रम में ही रहते हैं।
 
Sri Maheshwar said - Devi! All the Vanaprasthas are engaged in penance, some of them are free wanderers (they do not keep their wives with them) and some live with their wives. The free wandering sages shave their heads and wear saffron clothes; (they do not have a particular place) but those who live with their wives stay in their ashram at night.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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