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श्लोक  13.146.d94-d95 
शीलवृत्तविनीतस्य निगृहीतेन्द्रियस्य च॥
आर्जवे वर्तमानस्य सर्वभूतहितैषिण:।
प्रियातिथेश्च क्षान्तस्य धर्मार्जितधनस्य च॥
गृहाश्रमपदस्थस्य किमन्यै: कृत्यमाश्रमै:।
 
 
अनुवाद
जो गृहस्थ विनम्र और सदाचारी है, जिसने अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया है, जो सरलता से आचरण करता है और सभी प्राणियों का हितैषी है, जो अतिथियों से प्रेम करता है, जो क्षमाशील है और जिसने धर्मपूर्वक धन कमाया है, उसकी क्या आवश्यकता है?
 
What need is there for a householder who is humble and virtuous, who has controlled his senses, who behaves simply and is well-wisher of all creatures, who loves guests, who is forgiving and who has earned wealth righteously?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)