श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 146: शिव-पार्वतीका धर्मविषयक संवाद—वर्णाश्रमधर्मसम्बन्धी आचार एवं प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप धर्मका निरूपण  »  श्लोक d56
 
 
श्लोक  13.146.d56 
शूद्रो धर्मफलैरिष्टै: स्वधर्मेणोपयुज्यते।
एवमादि तथान्यच्च शूद्रधर्म इति स्मृत:॥ )
 
 
अनुवाद
ऐसा शूद्र अपने धर्म से धन्य हो जाता है और उसके इच्छित फल भोगता है। इसे और कई अन्य बातों को भी शूद्र धर्म कहा जाता है।
 
Such a Shudra is blessed with his Dharma and enjoys its desired fruits. This and many other things are also called Shudra Dharma.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)