श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 146: शिव-पार्वतीका धर्मविषयक संवाद—वर्णाश्रमधर्मसम्बन्धी आचार एवं प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप धर्मका निरूपण  »  श्लोक d48
 
 
श्लोक  13.146.d48 
तप एव सदा धर्मो ब्राह्मणस्य न संशय:।
स तु धर्मार्थमुत्पन्न: पूर्वं धात्रा तपोबलात्॥ )
 
 
अनुवाद
इसमें कोई संदेह नहीं कि ब्राह्मण का कर्तव्य सदैव तप करना है। पूर्वकाल में विधाता ने अपने तप बल से ब्राह्मणों को धार्मिक अनुष्ठान करने के लिए उत्पन्न किया था।
 
There is no doubt that the duty of a Brahmin is to always perform penance. In the past, the Creator had created Brahmins with his power of penance to perform religious rituals.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)