श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 146: शिव-पार्वतीका धर्मविषयक संवाद—वर्णाश्रमधर्मसम्बन्धी आचार एवं प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप धर्मका निरूपण  »  श्लोक d33
 
 
श्लोक  13.146.d33 
नमोऽस्तु बहुनेत्राय लोकरक्षणतत्पर।
अहो देवस्य माहात्म्यमहो देवस्य वै कृपा॥
एवं धर्मपरत्वं च देवदेवस्य चार्हति।
 
 
अनुवाद
हे लोकों की रक्षा में सदैव तत्पर रहने वाले शंकर! आपके अनेक नेत्र हैं, मैं आपको प्रणाम करता हूँ। अहा! महादेवजी की क्या महानता है। अहा! रुद्रदेव की क्या कृपा है। ऐसी धर्मनिष्ठा केवल देवों के देव महादेव के लिए ही योग्य है।
 
O Shankar who is always ready to protect the people! You have many eyes, I salute you. Oh! What a greatness Mahadevji has. Oh! What a grace Rudradev has. Such devotion to religion is worthy of only the God of Gods Mahadev.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)