श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 146: शिव-पार्वतीका धर्मविषयक संवाद—वर्णाश्रमधर्मसम्बन्धी आचार एवं प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप धर्मका निरूपण  »  श्लोक d2
 
 
श्लोक  13.146.d2 
रज्जुना नागराजेन मथ्यमाने महोदधौ।
विषं तत्र समुद्भूतं सर्वलोकविनाशनम्॥
 
 
अनुवाद
जब सर्पराज वासुकी की रस्सी से बंधे हुए मंदार पर्वत रूपी मथानी से समुद्र मंथन किया जा रहा था, तो एक विष निकला जो समस्त लोकों को नष्ट करने में सक्षम था।
 
When the ocean was being churned by the churning rod in the form of Mount Mandara tied to the rope of King of Serpents Vasuki, there emerged a poison capable of destroying all the worlds.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)