श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 146: शिव-पार्वतीका धर्मविषयक संवाद—वर्णाश्रमधर्मसम्बन्धी आचार एवं प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप धर्मका निरूपण  »  श्लोक d12
 
 
श्लोक  13.146.d12 
पिनाकं नाम मे चापं शार्ङ्गं नाम हरेर्धनु:॥
तृतीयमवशेषेण गाण्डीवमभवद् धनु:।
 
 
अनुवाद
मेरे धनुष का नाम पिनाक था और श्री हरि के धनुष का नाम शार्ङ्ग था। उस वेणु के अवशेष से एक तीसरा धनुष बनाया गया, जिसका नाम गांडीव रखा गया।
 
My bow was named Pinaka and Shri Hari's bow was named Sharanga. A third bow was made from the remains of that Venu, which was named Gandiva.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)