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mahabharat 13.146.97: पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने यज्ञ करते हुए जो अमृत पिया था और जो स्वर्ग में फैला है, उसे ब्रह्मा कहते हैं (क्योंकि ब्रह्माजी ने उसे पिया था)। जो लोग उसके झाग को थोड़ा-थोड़ा करके इकट्ठा करते हैं और उसे सदा पीते रहते हैं (और उसी पर जीवन निर्वाह करते हैं तथा तपस्या में लगे रहते हैं) वे फेनप कहलाते हैं॥97॥   |   mahabharat अध्याय 13.146: शिव-पार्वतीका धर्मविषयक संवाद—वर्णाश्रमधर्मसम्बन्धी आचार एवं प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप धर्मका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.146.97 
उञ्छन्ति सततं ये ते ब्राह्मॺं फेनोत्करं शुभम्।
अमृतं ब्रह्मणा पीतमध्वरे प्रसृतं दिवि॥ ९७॥
 
 
अनुवाद
पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने यज्ञ करते हुए जो अमृत पिया था और जो स्वर्ग में फैला है, उसे ब्रह्मा कहते हैं (क्योंकि ब्रह्माजी ने उसे पिया था)। जो लोग उसके झाग को थोड़ा-थोड़ा करके इकट्ठा करते हैं और उसे सदा पीते रहते हैं (और उसी पर जीवन निर्वाह करते हैं तथा तपस्या में लगे रहते हैं) वे फेनप कहलाते हैं॥97॥
 
The nectar which Brahma drank in the past while performing a sacrifice and which is spread in the heaven is called Brahma (because it was drunk by Brahma). Those who collect its foam little by little and drink it all the time (and live on it and remain engaged in austerities) are called Fenap*॥ 97॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)