Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 13.146.93: महेश्वर! जब ये ऋषिगण अग्नि में घी की आहुति देते हैं, तो उसके धुएँ से उत्पन्न सुगन्ध सम्पूर्ण आश्रम में फैल जाती है। उसे देखकर मेरा मन सदैव प्रसन्न रहता है॥93॥   |   mahabharat अध्याय 13.146: शिव-पार्वतीका धर्मविषयक संवाद—वर्णाश्रमधर्मसम्बन्धी आचार एवं प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप धर्मका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 146: शिव-पार्वतीका धर्मविषयक संवाद—वर्णाश्रमधर्मसम्बन्धी आचार एवं प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप धर्मका निरूपण  »  श्लोक 93
 
 
श्लोक  13.146.93 
आज्यधूमोद्भवो गन्धो रुणद्धीव तपोवनम्।
तं दृष्ट्वा मे मन: प्रीतं महेश्वर सदा भवेत्॥ ९३॥
 
 
अनुवाद
महेश्वर! जब ये ऋषिगण अग्नि में घी की आहुति देते हैं, तो उसके धुएँ से उत्पन्न सुगन्ध सम्पूर्ण आश्रम में फैल जाती है। उसे देखकर मेरा मन सदैव प्रसन्न रहता है॥93॥
 
Maheshwar! When these sages offer ghee in the fire, the fragrance generated by the smoke spreads all over the ashram. Seeing it, my mind always remains happy. ॥93॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)