श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 146: शिव-पार्वतीका धर्मविषयक संवाद—वर्णाश्रमधर्मसम्बन्धी आचार एवं प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप धर्मका निरूपण  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  13.146.87 
न चैकत्र समासक्तो न चैकग्रामगोचर:।
मुक्तो ह्यटति निर्मुक्तो न चैकपुलिनेशय:॥ ८७॥
 
 
अनुवाद
संन्यासी को किसी एक स्थान में आसक्ति नहीं रखनी चाहिए, एक ही गाँव में नहीं रहना चाहिए और एक ही तट पर सदा नहीं सोना चाहिए। उसे सब प्रकार की आसक्तियों से मुक्त होना चाहिए और स्वतन्त्रतापूर्वक विचरण करना चाहिए ॥87॥
 
A Sanyasi should not have attachment to any one place, should not stay in one village and should not sleep on one bank all the time. He should be free from all types of attachments and should move freely. ॥ 87॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)