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mahabharat 13.146.86: जो मनुष्य विवेकशील बुद्धिवाला संन्यासी होकर श्रवण, ध्यान, निदिध्यासन आदि मोक्षदायक कार्यों में अपना समय व्यतीत करता है, निराहार (इन्द्रिय सुखों से रहित) रहता है और लकड़ी के तख्ते के समान स्थिर रहता है, वह सनातन धर्म के मोक्षरूप को प्राप्त होता है ॥86॥   |   mahabharat अध्याय 13.146: शिव-पार्वतीका धर्मविषयक संवाद—वर्णाश्रमधर्मसम्बन्धी आचार एवं प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप धर्मका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.146.86 
स्थाणुभूतो निराहारो मोक्षदृष्टेन कर्मणा।
परिव्रजेति यो युक्तस्तस्य धर्म: सनातन:॥ ८६॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य विवेकशील बुद्धिवाला संन्यासी होकर श्रवण, ध्यान, निदिध्यासन आदि मोक्षदायक कार्यों में अपना समय व्यतीत करता है, निराहार (इन्द्रिय सुखों से रहित) रहता है और लकड़ी के तख्ते के समान स्थिर रहता है, वह सनातन धर्म के मोक्षरूप को प्राप्त होता है ॥86॥
 
One who becomes a sannyasi with a rational mind and spends his time in activities conducive to salvation, like listening, meditation, Nididhyasan etc., remains fasting (free from sensual pleasures) and remains stable like a wooden plank, he attains the salvation form of Sanatan Dharma. 86॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)