Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.146.84-85: द्विज तपस्वी को उचित है कि वह सब प्रकार के मोह और ममता से मुक्त होकर वृक्ष के नीचे, निर्जन घर में या नदी के तट पर रहकर सदैव अपने हृदय में भगवान का ध्यान करता रहे । 84-85॥ | mahabharat अध्याय 13.146: शिव-पार्वतीका धर्मविषयक संवाद—वर्णाश्रमधर्मसम्बन्धी आचार एवं प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप धर्मका निरूपण । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
वृक्षमूलपरो नित्यं शून्यागारनिवेशन:।
नदीपुलिनशायी च नदीतीररतिश्च य:॥ ८४॥
विमुक्त: सर्वसङ्गेषु स्नेहबन्धेषु च द्विज:।
आत्मन्येवात्मनो भावं समासज्जेत वै द्विज:॥ ८५॥
अनुवाद
द्विज तपस्वी को उचित है कि वह सब प्रकार के मोह और ममता से मुक्त होकर वृक्ष के नीचे, निर्जन घर में या नदी के तट पर रहकर सदैव अपने हृदय में भगवान का ध्यान करता रहे । 84-85॥
It is appropriate for a Dwija ascetic to free himself from all types of attachments and affections and always meditate on God within his heart while living under a tree, in an abandoned house or on the banks of a river. 84-85॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥