श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 146: शिव-पार्वतीका धर्मविषयक संवाद—वर्णाश्रमधर्मसम्बन्धी आचार एवं प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप धर्मका निरूपण  »  श्लोक 79
 
 
श्लोक  13.146.79 
एकेनांशेन धर्मार्थौ कर्तव्यौ भूतिमिच्छता।
एकेनांशेन कामार्थ एकमंशं विवर्धयेत्॥ ७९॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य उन्नति करना चाहता है, उसे चाहिए कि वह अपने धन के उपर्युक्त तीन भागों में से एक भाग धर्म और अर्थ की प्राप्ति के लिए उपयोग करे, दूसरा भाग उपभोग के लिए तथा तीसरा भाग प्रवृत्तिधर्म की वृद्धि करे॥ 79॥
 
A man who wants to progress should use one part of his wealth from the above mentioned three parts for achieving Dharma and Artha. The second part should be used for consumption and the third part should be increased (Pravrittidharma has been described).॥ 79॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)