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mahabharat 13.146.57-58: शूद्र का परम धर्म तीनों वर्णों की सेवा करना है। जो शूद्र सत्यनिष्ठ, अपनी इन्द्रियों को वश में रखने वाला तथा घर आए अतिथियों की सेवा करने वाला है, उसे महान तप का फल प्राप्त होता है। उसका सेवा धर्म उसके लिए कठिन तप है। 57-58   |   mahabharat अध्याय 13.146: शिव-पार्वतीका धर्मविषयक संवाद—वर्णाश्रमधर्मसम्बन्धी आचार एवं प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप धर्मका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.146.57-58 
शूद्रधर्म: परो नित्यं शुश्रूषा च द्विजातिषु॥ ५७॥
स शूद्र: संशिततपा: सत्यवादी जितेन्द्रिय:।
शुश्रूषुरतिथिं प्राप्तं तप: संचिनुते महत्॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
शूद्र का परम धर्म तीनों वर्णों की सेवा करना है। जो शूद्र सत्यनिष्ठ, अपनी इन्द्रियों को वश में रखने वाला तथा घर आए अतिथियों की सेवा करने वाला है, उसे महान तप का फल प्राप्त होता है। उसका सेवा धर्म उसके लिए कठिन तप है। 57-58
 
The ultimate religion of a Shudra is to serve all the three castes. A Shudra who is truthful, has controlled his senses and serves the guests who come to his home, accumulates great penance. His religion of service is a tough penance for him. 57-58.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)