श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 146: शिव-पार्वतीका धर्मविषयक संवाद—वर्णाश्रमधर्मसम्बन्धी आचार एवं प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप धर्मका निरूपण  »  श्लोक 54-55
 
 
श्लोक  13.146.54-55 
वैश्यस्य सततं धर्म: पाशुपाल्यं कृषिस्तथा।
अग्निहोत्रपरिस्पन्दो दानाध्ययनमेव च॥ ५४॥
वाणिज्यं सत्पथस्थानमातिथ्यं प्रशमो दम:।
विप्राणां स्वागतं त्यागो वैश्यधर्म: सनातन:॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
पशुपालन, कृषि, व्यापार, अग्निहोत्र, दान, अध्ययन, सन्मार्ग का अनुसरण और सदाचार का पालन, अतिथि सत्कार, संयम, ब्राह्मणों का सत्कार और यज्ञ- ये सब वैश्यों के सनातन धर्म हैं ॥54-55॥
 
Animal husbandry, agriculture, business, Agnihotra rituals, charity, studies, following the right path and following good conduct, hospitality, self-control, welcoming Brahmins and sacrifice - all these are the eternal religion of the Vaishyas. ॥ 54-55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)