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श्लोक  13.146.44-45 
सुसम्मृष्टोपलिप्ते च साज्यधूमो भवेद् गृहे॥ ४४॥
एष द्विजजने धर्मो गार्हस्थ्यो लोकधारण:।
द्विजानां च सतां नित्यं सदैवैष प्रवर्तते॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
घर में झाड़ू-पोंछा करके, शुद्धि करके, घी की आहुति देकर धुआँ फैलाना चाहिए। यह ब्राह्मणों का गृहस्थ कर्तव्य है, जिससे जगत की रक्षा होती है। श्रेष्ठ ब्राह्मणों के घर में इस कर्तव्य का सदैव पालन होता है ॥44-45॥
 
After sweeping and cleaning the house, the smoke should be spread after offering ghee as oblation. This is the domestic duty of Brahmins, which protects the world. This duty is always followed in the houses of good Brahmins. ॥ 44-45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)