श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 146: शिव-पार्वतीका धर्मविषयक संवाद—वर्णाश्रमधर्मसम्बन्धी आचार एवं प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप धर्मका निरूपण  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  13.146.40 
अतिथिव्रतता धर्मो धर्मस्त्रेताग्निधारणम्।
इष्टीश्च पशुबन्धांश्च विधिपूर्वं समाचरेत्॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
अतिथियों का सत्कार करना तथा गार्हपत्य आदि तीन प्रकार की अग्नियों की रक्षा करना उसका कर्तव्य है। उसे विविध प्रकार के इष्टयों तथा पशुरक्षा अनुष्ठानों का भी विधिपूर्वक पालन करना चाहिए।
 
It is his duty to welcome guests and to protect the three types of fires such as Garhapatya etc. He should also perform various types of Ishtiyas and animal protection rituals in a proper manner. 40.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)