श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 146: शिव-पार्वतीका धर्मविषयक संवाद—वर्णाश्रमधर्मसम्बन्धी आचार एवं प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप धर्मका निरूपण  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  13.146.33 
गुरुदैवतपूजार्थं स्वाध्यायाभ्यसनात्मक:।
देहिभिर्धर्मपरमैश्चर्तव्यो धर्मसम्भव:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण को गुरु और देवताओं की पूजा करनी चाहिए तथा स्वाध्याय और अभ्यास रूपी धर्म का पालन करना चाहिए। भक्त देहधारियों के लिए धर्म का आचरण करना उचित है। 33॥
 
A Brahmin must worship the Guru and the Gods and follow the Dharma in the form of self-study and practice. It is appropriate for the devout embodied beings to practice virtuous religion. 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)