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mahabharat 13.146.21-22: हे प्रभु! यहाँ उपस्थित ये समस्त ऋषियों का समूह, जो सदैव तपस्या में लीन रहते हैं और तपस्वी वेश में संसार में विचरण करते हैं, ये सभी नाना प्रकार के स्वरूप वाले हैं। हे शत्रुनाशक शिव! इस ऋषियों के समूह को तथा मुझे भी प्रसन्न करने की इच्छा से आप मेरी इस शंका का समाधान कीजिए। ॥21-22॥   |   mahabharat अध्याय 13.146: शिव-पार्वतीका धर्मविषयक संवाद—वर्णाश्रमधर्मसम्बन्धी आचार एवं प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप धर्मका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.146.21-22 
अयं मुनिगण: सर्वस्तपस्तेप इति प्रभो।
तपोवेषकरो लोके भ्रमते विविधाकृति:॥ २१॥
अस्य चैवर्षिसंघस्य मम च प्रियकाम्यया।
एतं ममेह संदेहं वक्तुमर्हस्यरिंदम॥ २२॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! यहाँ उपस्थित ये समस्त ऋषियों का समूह, जो सदैव तपस्या में लीन रहते हैं और तपस्वी वेश में संसार में विचरण करते हैं, ये सभी नाना प्रकार के स्वरूप वाले हैं। हे शत्रुनाशक शिव! इस ऋषियों के समूह को तथा मुझे भी प्रसन्न करने की इच्छा से आप मेरी इस शंका का समाधान कीजिए। ॥21-22॥
 
Lord! This entire group of sages present here, always engaged in penance and roaming around in the world in the guise of ascetics; all of them have different types of appearance. O enemy-destroyer Shiva! With the desire to please this group of sages and me too, please resolve this doubt of mine. ॥21-22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)