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श्लोक  13.146.103-104h 
ये त्वन्ये शुद्धमनसो दयाधर्मपरायणा:।
सन्तश्चक्रचरा: पुण्या: सोमलोकचराश्च ये॥ १०३॥
पितृलोकसमीपस्थास्त उञ्छन्ति यथाविधि।
 
 
अनुवाद
इनके अतिरिक्त और भी बहुत से शुद्ध हृदय वाले, दयालु और धर्मात्मा महात्मा हैं, जिनमें से कुछ चक्राचारी हैं, कुछ सोमलोक में और कुछ पितृलोक के निकट रहते हैं। ये सभी शास्त्रविधि के अनुसार उत्तम रीति से जीविका चलाते हैं॥103 1/2॥
 
Besides these, there are many other saints who are pure in heart, compassionate and pious, some of whom are Chakrachar (those who move like a wheel), some live in Somloka and some live near Pitriloka. All of them earn their livelihood in a noble way as per the scriptural method.॥103 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)