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mahabharat 13.146.100: मृगचर्म, वस्त्र और छाल ही उनके वस्त्र हैं। वे शीत और उष्ण के दुविधाओं से मुक्त, सन्मार्ग पर चलने वाले और तप से संपन्न हैं॥100॥   |   mahabharat अध्याय 13.146: शिव-पार्वतीका धर्मविषयक संवाद—वर्णाश्रमधर्मसम्बन्धी आचार एवं प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप धर्मका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.146.100 
मृगनिर्मोकवसनाश्चीरवल्कलवासस:।
निर्द्वन्द्वा: सत्पथं प्राप्ता वालखिल्यास्तपोधना:॥ १००॥
 
 
अनुवाद
मृगचर्म, वस्त्र और छाल ही उनके वस्त्र हैं। वे शीत और उष्ण के दुविधाओं से मुक्त, सन्मार्ग पर चलने वाले और तप से संपन्न हैं॥100॥
 
Deerskin, cloth and bark are their only clothes. They are free from the dilemmas of cold and heat, follow the right path and are rich in austerity.॥100॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)