श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक d6-d7
 
 
श्लोक  13.145.d6-d7 
सर्वेषामेव लोकानां कूटस्थं विद्धि मां प्रिये॥
मदधीनास्त्रयो लोका यथा विष्णौ तथा मयि।
स्रष्टा विष्णुरहं गोप्ता इत्येतद् विद्धि भामिनि॥
 
 
अनुवाद
प्रिये! मुझे समस्त लोकों में तटस्थ समझो। तीनों लोक मेरे अधीन हैं। जैसे वे भगवान विष्णु के अधीन हैं, वैसे ही मेरे भी अधीन हैं। भामिनी! तुम्हें यह जानना चाहिए कि भगवान विष्णु जगत के रचयिता हैं और मैं उनका रक्षक हूँ।
 
Dear one! Consider me to be neutral in all the worlds. All the three worlds are under my control. Just as they are under the control of Lord Vishnu, they are under my control too. Bhaamini! You should know that Lord Vishnu is the creator of the world and I am its protector.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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