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mahabharat 13.145.51: तत्पश्चात् उन्होंने पार्वती से कहा - 'हे सुन्दरी! हे रुचिरन! मैंने जिन कारणों से ये रूप धारण किए हैं, वे मैं तुमसे कहता हूँ, सुनो॥ 51॥   |   mahabharat अध्याय 13.145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  13.145.51 
ततस्तामब्रवीद् देव: सुभगे श्रूयतामिति।
हेतुभिर्यैर्ममैतानि रूपाणि रुचिरानने॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् उन्होंने पार्वती से कहा - 'हे सुन्दरी! हे रुचिरन! मैंने जिन कारणों से ये रूप धारण किए हैं, वे मैं तुमसे कहता हूँ, सुनो॥ 51॥
 
Thereafter he said to Parvati - 'O beautiful one! O Ruchiran! I am telling you the reasons due to which I have taken these forms, listen. ॥ 51॥
 
इतिश्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उमामहेश्वरसंवादोनाम चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय: ॥ १४० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमामहेश्वरसंवादनामक एक सौ चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४०॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ५७ १/२ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)