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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  13.145.49 
एतन्मे संशयं सर्वं वक्तुमर्हसि वै प्रभो।
सधर्मचारिणी चाहं भक्ता चेति वृषध्वज॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! हे वृषध्वज! कृपया मेरे इन सब संदेहों का निवारण करें; क्योंकि मैं आपकी पत्नी और भक्त हूँ ॥49॥
 
Lord! O Vrishadhwaj! Please resolve all these doubts of mine; because I am your wife and devotee. ॥49॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)