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श्लोक 13.145.43  |
नेत्रे मे संवृते देवि त्वया बाल्यादनिन्दिते।
नष्टालोकस्तदा लोक: क्षणेन समपद्यत॥ ४३॥ |
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| अनुवाद |
| हे अनिन्दिते! हे देवी! आपने अपने भोलेपन के कारण मेरे दोनों नेत्र बंद कर दिए। इससे सम्पूर्ण जगत् का प्रकाश क्षण भर में लुप्त हो गया। ॥ 43॥ |
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| Devi! O Anindite! Due to your innocence you closed both my eyes. Due to this, the light of the entire world vanished in a moment. ॥ 43॥ |
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