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mahabharat 13.145.39: पर्वत को यथावत देखकर पतिव्रता पार्वती देवी अत्यंत प्रसन्न हुईं और उन्होंने समस्त लोकों के स्वामी तथा कल्याण के स्वरूप महेश्वरदेव से पूछा।   |   mahabharat अध्याय 13.145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  13.145.39 
प्रकृतिस्थं गिरिं दृष्ट्वा प्रीता देवं महेश्वरम्।
उवाच सर्वलोकानां पतिं शिवमनिन्दिता॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
पर्वत को यथावत देखकर पतिव्रता पार्वती देवी अत्यंत प्रसन्न हुईं और उन्होंने समस्त लोकों के स्वामी तथा कल्याण के स्वरूप महेश्वरदेव से पूछा।
 
Seeing the mountain in its original state, the devoted wife Parvati Devi was very pleased. Then she asked Maheshwardev, the lord of all the worlds and the embodiment of welfare.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)